“क्या आपने कभी देखा है, जब सवालों से बचने के लिए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर ताले जड़ दिए जाएं? जब एक अस्पताल के निरीक्षण से पहले ही सवाल पूछने वालों को बैरिकेड के पीछे धकेल दिया जाए? मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले से एक ऐसा ही चौकाने वाला मामला सामने आया है, जहां खुद केन्द्रीय मंत्री और स्थानीय सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के दौरे पर मीडिया की आवाज को दबाने की कोशिश की गई। क्या ये केवल सुरक्षा व्यवस्था थी या फिर अव्यवस्थाओं पर पर्दा डालने की साजिश? आइए जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम की सच्चाई, विस्तार से।”
मध्यप्रदेश के अशोकनगर में शनिवार को उस वक्त हंगामा मच गया जब स्थानीय सांसद और केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जिला अस्पताल के निरीक्षण के लिए पहुंचे। यह उनका पहली बार जिला अस्पताल का दौरा था, लेकिन प्रशासन की तैयारियां देख लोग हैरान रह गए। अस्पताल में अव्यवस्थाओं की पोल न खुल जाए, शायद इसी डर से मीडिया के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। पत्रकारों को अस्पताल के गेट के बाहर बैरिकेड लगाकर रोक दिया गया। मीडियाकर्मियों ने जब कवरेज करने की कोशिश की, तो प्रशासन और पुलिस ने न सिर्फ उन्हें अंदर जाने से रोका, बल्कि उनके साथ तीखी नोकझोंक भी हुई।
मीडिया कर्मियों का गुस्सा तब फूट पड़ा, जब उन्हें ‘पिंजरे’ में बंद कर दिया गया। पत्रकारों का आरोप है कि प्रशासन ने जानबूझकर उन्हें कवरेज से रोका ताकि मंत्री जी से असहज सवाल न पूछे जा सकें। कई पत्रकारों ने कहा कि अस्पताल की बदहाल स्थिति को छिपाने के लिए ये साजिश रची गई। दरअसल, जिस जिला अस्पताल का निरीक्षण किया जा रहा था, वहां एक दिन पहले एसएनसीयू (Special Newborn Care Unit) में शॉर्ट सर्किट की वजह से बड़ा हादसा टल गया था। पत्रकारों का कहना है कि अगर उन्हें कवरेज की अनुमति दी जाती, तो वे इस गंभीर घटना पर मंत्री से जवाब मांगते, लेकिन प्रशासन ने पहले ही रास्ता बंद कर दिया।
अस्पताल प्रशासन और जिला पुलिस ने इसे सुरक्षा कारणों से लिया गया निर्णय बताया। उनका कहना था कि मंत्री के दौरे के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए मीडिया को रोकना जरूरी था। लेकिन सवाल ये उठता है — क्या लोकतंत्र में व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर सवाल पूछने के अधिकार को रोका जा सकता है? क्या जिन समस्याओं को दिखाने के लिए मीडिया मौजूद थी, उन पर पर्दा डालना किसी भी सरकारी तंत्र के लिए स्वीकार्य है? प्रशासन का यह कदम पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर रहा है।
यह घटना सिर्फ मीडिया बनाम प्रशासन का मुद्दा नहीं है। यह सवाल है — उस तंत्र पर, जो जनता की आंखों और कानों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है। सिंधिया जी का दौरा जनता के लिए था, अस्पताल की व्यवस्था सुधारने के लिए था, लेकिन अगर मीडिया की मौजूदगी में निरीक्षण होता, तो शायद असली तस्वीर सामने आ पाती। जिला अस्पताल की हालत किसी से छुपी नहीं है — स्टाफ की कमी, उपकरणों की खराब स्थिति और बीते हादसे इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। ऐसे में मीडिया की रोकथाम सवाल खड़े करती है कि क्या मंत्री जी को इन समस्याओं से वाकिफ कराना वाकई प्रशासन चाहता है?