शराबबंदी लागू, आस्था की जीत या सियासी रणनीति?
मध्य प्रदेश की पवित्र भूमि पर एक बड़ा फैसला लागू हो चुका है— शराबबंदी! आज से उज्जैन, ओंकारेश्वर, महेश्वर, मैहर सहित 19 धार्मिक शहरों और कई ग्राम पंचायतों में शराब की एक भी बूंद नहीं बिकेगी। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे “नशामुक्ति की ओर ऐतिहासिक कदम” बताया, लेकिन क्या यह फैसला वाकई जनता के हित में है, या फिर इसके पीछे कुछ और ही खेल छिपा है?
जनता की आस्था का सम्मान या वोट बैंक की राजनीति?
यह फैसला 24 जनवरी को महेश्वर में कैबिनेट बैठक में पास हुआ, जहां की ऐतिहासिक धरोहर लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी हुई है। सरकार का कहना है कि यह निर्णय धार्मिक विश्वास और जनभावनाओं के सम्मान में लिया गया है, लेकिन विपक्ष इसे “राजनीतिक दिखावा” करार दे रहा है। क्या यह कदम सच में नशामुक्त समाज की ओर बढ़ता कदम है, या फिर महज चुनावी वादा?
इन क्षेत्रों में पूरी तरह से बंद हुई शराब की बिक्री
सरकार के आदेश के अनुसार, उज्जैन, ओंकारेश्वर, महेश्वर, मंडलेश्वर, ओरछा, मैहर, चित्रकूट, दतिया, पन्ना, मंडला, मुलताई, मंदसौर और अमरकंटक में सभी शराब की दुकानें और बार हमेशा के लिए बंद कर दिए गए हैं। इसके अलावा, सालकनपुर, कुंडलपुर, बंदकपुर, बर्मनकलां, बर्मनखुर्द और लिंगा की ग्राम पंचायतों में भी शराब की बिक्री पूरी तरह रोक दी गई है।
धार्मिक नगरी में शराबबंदी का क्या असर होगा?
उज्जैन में महाकाल मंदिर और अमरकंटक में नर्मदा नदी के उद्गम स्थल को देखते हुए यह फैसला सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे पर्यटन और स्थानीय व्यवसाय प्रभावित नहीं होंगे? होटल और बार संचालकों की मानें तो यह फैसला उनकी आजीविका पर गहरा प्रभाव डालेगा।
जनता की राय—न्याय या अन्याय?
इस फैसले को लेकर आम जनता की राय भी बंटी हुई है। कुछ लोग इसे “धार्मिक शहरों की पवित्रता बनाए रखने के लिए जरूरी” मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि “शराबबंदी से अवैध शराब की बिक्री बढ़ेगी और प्रशासन के लिए नई चुनौती खड़ी होगी।”
अब देखने वाली बात यह होगी कि यह ऐतिहासिक कदम वास्तव में नशामुक्त समाज की दिशा में बढ़ता कदम साबित होगा या फिर यह एक और चुनावी जुमला बनकर रह जाएगा!





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