Friday, February 28, 2025

क्या रात में महिलाओं की गिरफ्तारी जायज है? जानिए कानून और कोर्ट के फैसलों का पूरा सच।

भारत में महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को बनाए रखने के लिए भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 46(4) में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है। इस कानून के तहत, किसी भी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह नियम महिलाओं को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने और उनके सम्मान की रक्षा करने के उद्देश्य से बनाया गया है। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में इस नियम का पालन न करने की छूट दी गई है, जिसे लेकर हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट का एक अहम फैसला सामने आया है।

मद्रास हाई कोर्ट का फैसला: नियम या सिर्फ दिशा-निर्देश?
मद्रास हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में स्पष्ट किया कि महिलाओं की रात में गिरफ्तारी को लेकर जो प्रावधान हैं, वे अनिवार्य नहीं बल्कि केवल दिशा-निर्देश हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी महिला की गिरफ्तारी रात में की जाती है, तो इसे अवैध नहीं माना जाएगा, बशर्ते पुलिस अधिकारी ने इसके पीछे उचित कारण बताया हो। इसका मतलब यह हुआ कि पुलिस अधिकारी को अपनी कार्रवाई का स्पष्टीकरण देना होगा, लेकिन गिरफ्तारी अवैध नहीं मानी जाएगी।

गंभीर अपराधों में गिरफ्तारी का प्रावधान
मद्रास हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी गंभीर अपराध को रात में अंजाम दिया गया है और आरोपी महिला की गिरफ्तारी जरूरी है, तो पुलिस इसे टाल नहीं सकती। ऐसी स्थिति में अगर मजिस्ट्रेट उपलब्ध नहीं है, तो गिरफ्तारी को सही ठहराने के लिए उचित कारणों को दर्ज करना होगा। यह प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि गंभीर अपराधों में कानूनी कार्रवाई में कोई रुकावट न आए।

महिला सुरक्षा के लिए क्यों जरूरी है यह कानून?
सीआरपीसी की धारा 46(4) का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को सुनिश्चित करना है। वरिष्ठ वकील डॉ. अनुजा कपूर के अनुसार, इस कानून को इसलिए लागू किया गया ताकि रात में गिरफ्तारी के दौरान महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार या यौन शोषण की घटनाओं से बचा जा सके। यह कानून महिलाओं को सुरक्षा का आश्वासन देता है और उनके अधिकारों की रक्षा करता है।

विशेष परिस्थितियों में गिरफ्तारी की शर्तें
विशेष परिस्थितियों में, महिला पुलिस अधिकारी को स्थानीय मजिस्ट्रेट से अनुमति लेकर ही गिरफ्तारी करनी होती है। यदि मामला अत्यधिक गंभीर है, तो आरोपी महिला को हाउस-अरेस्ट करने का भी प्रावधान है, लेकिन यह कार्यवाही केवल महिला पुलिस की मौजूदगी में की जा सकती है। यह नियम यह सुनिश्चित करता है कि गिरफ्तारी प्रक्रिया में महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाए।

इतिहास और बदलाव: CrPC धारा 46(4) का सफर
CrPC की धारा 46(4) को 2005 में लागू किया गया, लेकिन इसका इतिहास 1989 में भारतीय विधि आयोग की 135वीं रिपोर्ट से जुड़ा है, जिसमें रात में महिलाओं की गिरफ्तारी पर रोक की सिफारिश की गई थी। इसके बाद 1996 में भी इसी विषय पर रिपोर्ट आई, जिसके बाद यह सुरक्षा प्रावधान लागू किया गया। इस कानून को लाने का मुख्य उद्देश्य महिलाओं की गरिमा और सम्मान को प्राथमिकता देना था।

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों का प्रभाव
2014 में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि महिलाओं की गिरफ्तारी के समय महिला कांस्टेबल का होना अनिवार्य है और रात में गिरफ्तारी से बचा जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी होती हैं कि इस आदेश का सख्ती से पालन करना मुश्किल हो सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि पुलिस को विशेष परिस्थितियों में अपने विवेक का इस्तेमाल करने की छूट दी गई, लेकिन महिला की सुरक्षा और सम्मान का पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए।

नियमों का सही पालन और महिला सुरक्षा की जिम्मेदारी
मद्रास हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह प्रावधान सिर्फ दिशा-निर्देश हैं या कानूनी बाध्यता। कोर्ट ने पुलिस को स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि ‘विशेष परिस्थितियां’ क्या होती हैं, ताकि कानून के पालन में कोई भ्रम न हो। इस फैसले का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि महिला की गिरफ्तारी केवल आवश्यक मामलों में हो और वह भी पूरी गरिमा और सम्मान के साथ।

क्या बदलाव की जरूरत है?
मद्रास हाई कोर्ट का फैसला महिला सुरक्षा और कानून के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता है, लेकिन यह भी जरूरी है कि इसका गलत इस्तेमाल न हो। महिलाओं की सुरक्षा केवल कानूनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि समाज की मानसिकता और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी निर्भर करती है। इसलिए, यह देखना महत्वपूर्ण है कि पुलिस इन दिशा-निर्देशों का सही तरीके से पालन करती है और महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
हाई कोर्ट की वकील अंतिमा गुप्ता के अनुसार, अगर पुलिस को महिला से पूछताछ करनी है और सूर्यास्त हो चुका है, तो पुलिस को उसके घर पर जाकर पूछताछ करनी होगी। महिला को थाने में नहीं बुलाया जा सकता। इसके अलावा, किसी भी महिला की जांच केवल महिला पुलिसकर्मी ही कर सकती है। यह नियम महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए बनाए गए हैं।

समाज और कानून का तालमेल जरूरी
महिला सुरक्षा के कानून तब ही प्रभावी होंगे जब पुलिस और समाज दोनों मिलकर इसे सही ढंग से लागू करेंगे। यह देखना महत्वपूर्ण है कि इन कानूनों का पालन पूरी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ किया जाए, ताकि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा की जा सके।

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