भयावह विस्फोट: मजदूरों की चीखों के बीच बिखरी जिंदगी
गुजरात की एक पटाखा फैक्ट्री में भयावह धमाका हुआ, जिसमें मध्य प्रदेश के हरदा और देवास के 21 मजदूरों की जान चली गई। यह हादसा इतना भयंकर था कि मजदूरों के अंग 50 मीटर दूर तक बिखर गए। कुछ मानव अंग खेतों में भी पाए गए, मानो मौत ने खुले मैदान में भी अपने निशान छोड़ दिए हों।
आंसुओं में डूबे परिवार, एंबुलेंस में ही अंतिम दर्शन
शव लेने के लिए पुलिस-प्रशासन के साथ मंत्री नागर सिंह भी गुजरात पहुंचे। शवों को पोस्टमॉर्टम के बाद उनके गांव भेजा गया, लेकिन दर्द इतना गहरा था कि परिजन अपनों को आखिरी बार देख भी नहीं सके। शवों की हालत इतनी क्षत-विक्षत थी कि एंबुलेंस में ही अंतिम दर्शन कराने का फैसला लिया गया।
“मैं फैक्ट्री में काम कर रहा था… फिर अचानक सब कुछ जल उठा!”
हादसे में बचा मजदूर विजय, जो पालनपुर के मेडिकल कॉलेज में इलाज करा रहा है, ने कहा,
“हम फैक्ट्री के अंदर काम कर रहे थे, तभी अचानक ज़ोरदार ब्लास्ट हुआ और मैं बेहोश हो गया। जब होश आया, तो चारों ओर आग थी। जलते शरीर के साथ किसी तरह बाहर भागा…”
चार दिन पहले गया राकेश, अब ताबूत में लौटा!
देवास के राकेश ने अपनी माँ शांताबाई से कहा था,
“माँ, मैं गुजरात कमाने जा रहा हूँ, एक महीने में लौट आऊंगा…”
लेकिन चार दिन बाद ही उसकी लाश घर पहुंची। उसके साथ पत्नी डाली और 7 साल की बेटी किरण भी इस हादसे में खत्म हो गए। अब उसकी छोटी बेटी नैना (4) अकेली बची है। परिवार पर पहले ही कर्ज का बोझ था और अब उनके सिर से एकमात्र सहारा भी चला गया।
लखन का पूरा परिवार खत्म, अब कोई नहीं बचा!
संदलपुर के भोपा कॉलोनी में रहने वाला लखन भी हादसे का शिकार हुआ, लेकिन उसके साथ उसकी पत्नी, बहन, छोटा भाई, मां और पिता भी इस आग में समा गए। अब गंगाराम भोपा का पूरा परिवार खत्म हो चुका है।
कब रुकेगा मजदूरों की मौत का यह सिलसिला?
इस दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है – क्या गरीबों की जिंदगी इतनी सस्ती है? कब तक मजदूरों को असुरक्षित फैक्ट्रियों में भेजा जाता रहेगा? सरकारें मुआवजा देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेती हैं, लेकिन क्या उनके घरों के बुझ चुके चिराग वापस आ सकेंगे?