आतिशबाजी, गुलाब और ‘थैंक्यू मोदीजी’—क्या सबकुछ इतना आसान है?
भोपाल की सड़कों पर बुधवार को एक अजीब नजारा देखने को मिला। मुस्लिम महिलाओं के हाथों में गुलाब थे, तख्तियों पर “थैंक्यू मोदीजी” लिखा था, और आसमान में आतिशबाजी हो रही थी। यह सब वक्फ संशोधन विधेयक 2025 के समर्थन में था। लेकिन क्या वाकई यह समर्थन था, या फिर पर्दे के पीछे कोई और खेल खेला जा रहा था? कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद का कहना है कि ये महिलाएं स्पॉन्सर्ड हैं—यानी यह सबकुछ एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। तो क्या भोपाल में जो दिख रहा है, वह असली हकीकत है या किसी राजनीतिक साजिश का पर्दा?
कलेक्टर को दी गई ज़िम्मेदारी—लेकिन वक्फ संपत्तियों का सच क्या है?
इस विधेयक के तहत अब कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों की देखरेख का अधिकार दिया जा रहा है। लेकिन आरिफ मसूद के अनुसार, यही कलेक्टर पहले कब्रिस्तानों को सरकारी संपत्ति घोषित कर चुके हैं। सवाल उठता है कि अगर 1959 और 1947 के दस्तावेज़ों में यह संपत्ति वक्फ की बताई गई है, तो फिर अचानक इसे सरकारी क्यों घोषित किया जा रहा है? क्या यह कोई भूमाफियाओं का खेल है, या फिर सरकार सच में पारदर्शिता लाना चाहती है?
संपत्ति का सही उपयोग या सत्ता का दुरुपयोग?
भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने एक और बड़ा दावा किया—उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेता वर्षों से वक्फ बोर्ड की संपत्तियों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका आरोप है कि यह संपत्ति गरीबों की भलाई के लिए होनी चाहिए, लेकिन इसका पैसा नेताओं की जेब में जा रहा है। अगर वाकई ऐसा है, तो यह चिंता की बात है। लेकिन क्या सरकार अब सच में इसे गरीबों के हित में इस्तेमाल करेगी, या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक हथकंडा है?
यह बिल किसी कौम के खिलाफ नहीं, लेकिन विरोध क्यों?
मंत्री विश्वास सारंग का कहना है कि इस बिल का विरोध सिर्फ वे नेता कर रहे हैं, जो अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं। उनका दावा है कि भोपाल के हजारों मुस्लिम भाई-बहनों ने इस बिल का समर्थन किया है। लेकिन सवाल यह है कि अगर बिल सही दिशा में है, तो फिर इतने विरोध के सुर क्यों उठ रहे हैं? क्या सच में यह विधेयक आम मुसलमानों के हित में है, या फिर चंद अमीर लोगों के खिलाफ उठाया गया कदम?
वक्फ संपत्तियों का खेल—नया बिल क्या बदलाव लाएगा?
पुराने कानून के अनुसार, वक्फ बोर्ड किसी भी संपत्ति पर दावा करता था, तो उसे ट्रिब्यूनल में चुनौती दी जा सकती थी, लेकिन अब नए विधेयक में यह बदलाव किए गए हैं: अब ट्रिब्यूनल के अलावा हाईकोर्ट और सिविल कोर्ट में भी अपील की जा सकेगी।
अगर किसी ने वक्फ को जमीन दान नहीं दी है, तो मस्जिद बनी होने के बावजूद वह वक्फ संपत्ति नहीं मानी जाएगी।
पहली बार वक्फ बोर्ड में महिलाओं और अन्य धर्मों के लोगों को भी शामिल किया जाएगा।
तो फिर असली मुद्दा क्या है?
क्या यह विधेयक सच में सुधार के लिए लाया गया है, या फिर यह सिर्फ राजनीतिक हथियार है? क्या भोपाल में हुए जश्न के पीछे कोई बड़ी रणनीति छिपी है, या फिर यह सच में बदलाव की शुरुआत है? इस पूरे मामले में सवाल ज्यादा हैं, जवाब कम। अब देखना होगा कि जनता इस पर क्या राय बनाती है—क्या यह बदलाव सही दिशा में है, या फिर इसके पीछे कोई छुपी राजनीतिक चाल है?