खेत-खलिहान में स्वाभाविक रूप से उगने वाला मदार (मिल्कवीड) का पौधा अब जंगली नहीं रहा। इससे कपड़ा बनाने की तकनीक तैयार हो चुकी है, जो भारतीय वस्त्र उद्योग में एक नई क्रांति ला सकती है। मदार के रेशे से तैयार कपड़े की खासियत यह है कि यह कपास के मुकाबले कहीं अधिक गर्माहट प्रदान करते हैं। विशेषकर, मदार के रेशे से बने कपड़े माइनस 50 डिग्री सेल्सियस जैसे कठोर तापमान में भी शरीर को गर्म रखते हैं, जो इसे सर्दियों में उपयोग के लिए आदर्श बनाता है। केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने इस नई तकनीक की जानकारी देते हुए बताया कि इससे न सिर्फ कृषि को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि किसानों की आय में भी महत्वपूर्ण बढ़ोतरी होगी।
गाजियाबाद में मदार के पौधों का दो एकड़ में प्रायोगिक रूप से रोपण किया गया था, जिसमें एक एकड़ से चार हजार किलोग्राम रेशा निकला। इस रेशे का इस्तेमाल वस्त्र बनाने में किया जाएगा। मदार के रेशे से कागज भी तैयार किया जा सकता है, और ऊन के साथ मिलाकर इसे गर्म कपड़ों जैसे कोट और रजाई में उपयोग किया जा सकता है। जर्मनी में मदार के रेशे से बने कोट को -50 डिग्री तापमान में पहनने पर भी सर्दी का अनुभव नहीं हुआ। इससे साफ है कि मदार के फाइबर की गर्माहट ऊन से भी ज्यादा प्रभावी है, जिससे यह सर्दियों के लिए बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है।
केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि भारत अब कपास के उच्च घनत्व वाले पौधरोपण (HD) की ओर बढ़ रहा है, और महाराष्ट्र के अकोला में एचडीपी पैटर्न पर कपास की खेती से एक हेक्टेयर में तीन हजार किलोग्राम फाइबर का उत्पादन हुआ है, जो पहले के मुकाबले कई गुना अधिक है। इस नई पहल से देश में वस्त्र और परिधान के उत्पादन में भारी वृद्धि होगी, और भारत का वस्त्र उद्योग 2030 तक 350 बिलियन डॉलर के बाजार तक पहुंच जाएगा। इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं भी बढ़ेंगी, जिससे लाखों लोग लाभान्वित होंगे।







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