मध्य प्रदेश में मेडिकल सीटों की काउंसलिंग में एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई है, जहां एनआरआई कोटे से सीटों का अलॉटमेंट विवादों में आ गया है। उच्च न्यायालय द्वारा एनआरआई कोटे पर लगी रोक हटने के बाद, चिकित्सा शिक्षा संचालनालय द्वारा आयोजित नीट पीजी काउंसलिंग में 31 सीटें उन छात्रों को दे दी गईं, जो मध्य प्रदेश के निवासी नहीं थे। ये सीटें उन छात्रों को अलॉट की गईं जिन्होंने काउंसलिंग में हिस्सा नहीं लिया था, और कुछ तो ऐसे थे जिन्होंने गलत डोमिसाइल प्रमाणपत्र के आधार पर सीटें प्राप्त की। इस मामले की गंभीरता तब बढ़ी जब काउंसलिंग के डेटा की जांच में खुलासा हुआ कि इन 31 सीटों पर दूसरे राज्यों के छात्रों ने कब्जा कर लिया, जबकि ये सीटें केवल मध्य प्रदेश के मूल निवासियों के लिए आरक्षित थीं।
इन गड़बड़ियों का खुलासा होते ही यह बात सामने आई कि मध्य प्रदेश के आठ निजी मेडिकल कॉलेजों में गलत तरीके से एनआरआई कोटे से 91 सीटें अलॉट की गईं। इनमें से 31 सीटें दूसरे राज्यों के निवासियों को दी गईं। खास बात यह है कि इनमें से कई छात्रों ने रजिस्ट्रेशन भी नहीं कराया था, फिर भी उन्हें सीटें अलॉट हो गईं। एक विशेष मामले में, आंध्र प्रदेश के एक छात्र को इंदौर के कॉलेज में सीट मिली, जबकि उसने खुद को असम का निवासी बताया था। इसी तरह असम की एक छात्रा को भी मध्य प्रदेश का मूल निवासी बताया गया और देवास में एमडी रेडियोलॉजी की सीट दी गई।
यह गड़बड़ी मेडिकल काउंसलिंग प्रक्रिया की पारदर्शिता और ईमानदारी पर सवाल खड़ा करती है। हालांकि, अधिकारियों ने कहा है कि वे बिना रजिस्ट्रेशन या गलत दस्तावेजों के आधार पर अलॉट की गई सीटों की जांच करेंगे और यदि कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो सीटें रद्द कर दी जाएंगी। इस मामले में कार्रवाई की जाएगी और दोषियों को कड़ी सजा दिलाने का आश्वासन भी दिया गया है। इस प्रकार के घोटाले से यह सवाल उठता है कि क्या शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और सही प्रक्रिया को सुनिश्चित किया जा रहा है, और इस घोटाले से जुड़े सभी आरोपियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा या नहीं।







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