हीमोफीलिया एक रक्त से संबंधित बीमारी है, जो वंशानुगत होती हैं व जिसमें मुख्य समस्या है रक्त स्राव। यानी किसी बच्चे या युवा को स्वयमेव, चोट लगनें पर या ऑपरेशन के समय ज्यादा व कई बार देर तक रक्त बहता रहता हैं। ईश्वर ने मनुष्य को वरदान दिया है कि जब कभी उसके शरीर में चोट लगती है तो रक्त में उपस्थित कुछ तत्व जिसमें रासायनिक क्रिया द्वारा रक्त को जमा देते हैं जिससे रक्त स्राव रुक जाता है। इस बीमारी का पूर्ण इलाज संभव नहीं है किंतु बेहतर प्रबंधन से व्यक्ति स्वस्थ रह सकता है या बीमारी के लक्षणों में कमी रह सकती हैं। इस बीमारी का मुख्य कारण है रक्त में कुछ जीवन रक्षक तत्वो फैक्टर-8 व फैक्टर-9 की कमी या अनुपस्थित होना। पूरी दुनिया में हीमोफीलिया बीमारी के लक्षण, बचाव व इलाज के संबंध में समाज में जागरूकता हेतु विश्व हीमोफीलिया दिवस 17 अप्रैल को मनाया जाता हैं। विश्व हीमोफीलिया दिवस 2024 की थीम है “रक्तस्राव वाली बीमारियों से पीड़ित हर व्यक्ति तक न्याय संगत पहुंच ” जिसका तात्पर्य हैं कि हर रक्त स्राव लक्षण वाले संभावित व्यक्ति की जांच, इलाज व प्रबंधन सुनिश्चित किया जाना है। 95% से अधिक प्रकरण में यह बीमारी पुरुषों में ज्यादा होती है जबकि महिलाएं इस बीमारी की वाहक या कैरियर होती हैं। किंतु अपवाद भी हो सकता है। किसी महिला को हीमोफीलिया होने पर उनके माहवारी के दौरान या सिजेरियन प्रसव के दौरान चिकित्सक को ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
डॉ बी. एल. मिश्रा चिकित्सा विशेषज्ञ ने बताया कि हीमोफीलिया बीमारी के बढ़ने पर अक्सर शरीर के बड़े जोड़ जैसे कंधा, घुटना, ऐंडी, कुल्हा या मांस पेशियों, जांघ, घुटने के नीचे व कलाई के ऊपरी भाग में रक्त जमा हो जाता है। जिससे जोड़ों में सूजन व दर्द हो जाता है। कभी-कभी नाक, मूत्र व मल में ज्यादा मात्रा में रक्त आ सकता है। कई बार यह बीमारी मृत्यु का कारण बन जाती है जिसका प्रमुख कारण है अत्यधिक रक्तस्राव व बार-बार रक्ताधान से लीवर की बीमारी पीलिया व एड्स जैसी बीमारी से पीड़ित होना। इस बीमारी में मरीज शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व सामाजिक रूप से निशक्त हो जाता है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के परिजनों को चाहिए कि वह मरीज के रक्त स्राव होने पर घाव को साफ पानी से धोकर साफ कपड़े से रक्तस्राव रोकने हेतु दबाएं । सतत रूप से अस्पताल व चिकित्सक के संपर्क में रहे व फैक्टर-8 या 9 लगवाएं। साथ ही हमें यह जानना जरूरी है की क्या पीड़ित के परिवार के अन्य लोगों में तो रक्तस्राव के लक्षण नहीं हैं। यदि हम रीवा जिले में हीमोफीलिया बीमारी से पीड़ित स्वास्थ्य विभाग में पंजीकृत मरीजों की बात करें तो 37 मरीज हैं जिनमे 15 वर्ष से कम उम्र के 19, 16-30 वर्ष के 14 व 30 वर्ष से अधिक आयु के चार मरीज हैं। जिनमें बीमारी के दो श्रेणियां में विभाजित हीमोफीलिया A के 31 मरीज को फैक्टर-8 व हीमोफीलिया B के 6 मरीजों को फैक्टर-9 आवश्यकता अनुसार लगाया जाता हैं।
डॉ बी. एल. मिश्रा चिकित्सा विशेषज्ञ ने बताया कि हीमोफीलिया जैसी दिल दहला देने वाली बीमारी को परिवार स्तर पर, समुदाय स्तर पर व शासन स्तर पर प्रबंधन हेतु प्रयास होना चाहिए। मरीज को बीमारी के अनुसार संतुलित व पौष्टिक आहार, भरपूर नींद, योगा व कसरत, क्षमता अनुसार व्यवसाय, उचित पेंशन, सतत रूप से शासकीय ब्लड बैंक में ब्लड ग्रुप अनुसार रक्त व प्लाज्मा की उपलब्धता, दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाया जाना, मरीज के देश के विकास में सहयोग हेतु चिंतन होना चाहिए। ( डॉ बी एल मिश्रा )
Health: हीमोफीलिया के साथ शतायु हों,विश्व हीमोफीलिया दिवस 17 अप्रैल पर विशेष जानकारी, डॉ. बी एल मिश्रा एमडी (मेडिसिन) क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएंं (से. नि.)
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